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Wednesday, November 4, 2009

पहल....


"जो कहना मानेगा उसे ईनाम मिलेगा"

रोहित आज दौड़ में अव्वल आया है,और वो इस बात से ख़ुश है,कि बेशक वो अन्य बच्चों की तरह ज़िंदगी की एक ख़ास दौड़ में जल्दी शामिल न हो पाया हो(शिक्षा पाने की दौड़ में) पर आज वो भी इस दौड़ का हिस्सा बन चुका है, और उसी की ही तरह कई और बच्चे भी इसमें शामिल हो रहे हैं।
रोहित के माता-पिता जे.एन.यू में मज़दूरी करते हैं,
वहीं बेसिल, रजत, समीर, नेहा कुछ एक ऐसे नाम है ,जो अपने स्तर पर इन बच्चों को समाज की मुख्य धारा में शामिल करने का भरसक प्रयास कर रहे हैं ।बेसिल जवाहर लाल नेहरु विश्विद्यालय में सोशियोलॉजी का छात्र हैं,और इस संगठन के सबसे पुराने सदस्य ।जो हफ़्ते में 1 या 2 दिन केंद्रीयविद्यालय (जे.एन.यू) के प्रांगण में इन बच्चों को पढ़ाने आते हैं ।
बातचीत के कुछ अंश...
प्रश्न) इस तरह की पहल करने का विचार कैसे आया ?
जे.एन.यू (जवाहर लाल नेहरु विश्विद्यालय) में उन दिनों नए छात्रावास बन रहे थे, और कई राज्यों से आए मज़दूर यहाँ काम कर रहे थे । इन मज़दूरों के बच्चे को किसी भी तरह की शिक्षा नहीं मिल रही थी,और दिन भर ये बच्चे इधर उधर घूमा करते थे ।जिस वजह से मेरे मन में ऐसी एक पहल करने का विचार का आया ।

प्रश्न) शुरुआत में कितने सदस्य थे ?
शुरुआत में हम सिर्फ़ 3 सदस्य थे,जिसमें जे.एन.यू के ही सोशियोलॉजी, और राजनीतिशास्त्र के छात्र शामिल थे, आज हमारा 8 से 9 लोगों का समूह है,और साथ ही कुछ लोग “ वॉलेंटेयर ” के रुप में भी काम करते हैं ।

प्रश्न) कुल कितने बच्चे आते हैं यहाँ ?
हमारे साथ कुल 20 बच्चे हैं,पहले तो इनमें से कई बच्चे यहाँ आने से कतराते थे, पर फिर धीरे-धीरे ये हमसे जुड़ते चले गए ।

प्रश्न) बच्चे कौन कौन से दिन यहाँ आते हैं? और इन्हें यहाँ क्या कुछ सिखाया जाता है ?
ये बच्चे हर शुक्रवार को 3 से 6 बजे तक हमारे साथ रहते हैं, वैसे ये बच्चे स्कूल भी जाते हैं, और हम भी इन्हें खेल के माध्यम से ही कुछ न कुछ सिखाने की कोशिश करते हैं, जैसे गणित, हिंदी,अंग्रेज़ी।


प्रश्न) क्या इन बच्चों के साथ किसी तरह की परेशानी भी हुई ? अब इन बच्चों में आप किस तरह का बदलाव देखते हैं ?
शुरुआत में कुछ कठिनाईंयाँ ज़रुर महसूस हुईं,क्योंकि बच्चों की पारिवारिक पृष्ठभूमि थोड़ी अलग थी, घर का माहौल अलग था,इसलिए ये बच्चे आपस में जल्दी घुलते-मिलते नहीं थे, ये बच्चे बहुत “एग्रेसिव ” थे ,जिस वजह से इन्हें कुछ सिखाना भी थोड़ा मुश्किल हो जाता था, अब इनके व्यवहार में काफ़ी बदलाव देखने को मिल रहा है,या कहें कि अधिक सोशल हो रहे हैं । कई बार तो उस एग्रेशन (ग़ुस्से) को कम करने के लिए कहना पड़ता था....“ जो कहना मानेगा उसे ईनाम मिलेगा ”( मुस्काते हुए) ।

2 comments:

  1. बहुत अच्छी बात विकास भाई।

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  2. tumhara blog acha laga. lage raho

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