ताज़ा तरीन....

Friday, August 28, 2009

काश ....



आज आसमान में पूनम का चाँद निकला है, और ये चाँद बेहद खूबसूरत नज़र आ रहा है ....
इस चाँद की चमक के आगे मेरी आँखों की चमक मानों फीकी पड़ चुकी हो,
जानना नहीं चाहोगे, कि मेरे आखों में ये चमक क्यों है... ?
मैं बताता हूँ.....
ये चमक उन पलों को याद कर के आई है,
जब तुम और मैं साथ हुआ करते थे!
वो पल कितने खूबसूरत हुआ करते थे, बिलकुल इस चाँद की तरह, आज भी वो पल हैं.... मेरे साथ मेरी यादें बनकर !
काश तुम अपने घर की खिड़की खोलतीं और देखतीं इस चाँद को, और इस चांदनी रात को........!
काश ,काश तुम्हें वो पल भी याद आ जाते,जिन पलों में तुम और मैं... साथ थे ,और साथ हुआ करती थी ऐसी ही एक चांदनी रात
काश कि मुझे आज काश न कहना पड़ता ,
काश ये ग़म मुझ अकेले का न होता ,काश इन यादों को मैं अकेले न ढो रहा होता !
काश
कि मैं आज अकेला न होता !
वो पल जो तुमने और मैंने साथ बिताए थे ,काश ये यादें बनकर मुझे सता न रहीं होतीं

Saturday, August 22, 2009

ब्लॉग जगत


जब से मेरे हाथ में ये कंप्यूटर आया है ,और साथ ही साथ "ब्लोगिंग" (BLOGGING) का ये नया शौक लगा है तब से अब तक न जाने कितने ब्लॉग को देख चुका हूँ, और साथ ही साथ हैरानी भी होती है ये सोच कर कि कितना कुछ लिखा और पढ़ा जा रहा होगा ? आज एक आसान सा ज़रिया हम सभी के हाथ लग चुका है ,अपनी राय को दूसरों तक पहुँचाने का,या फिर अपने ही जज़्बात को अल्फाज़ देने का ! यहाँ आप ख़ुद अपने संपादक हैं ,किसी की कैंची चलने का भी डर नहीं ,जो लिखना चाहते हैं लिखये,कहिये और बांटिये ! इस "भानुमती के पिटारे " नुमाँ ब्लॉग जगत में बस एक बार आप घुस गए तो एक के बाद एक कड़ी जुड़ती जाती है ,और आपके सामने एक नई दुनिया होती है,जहाँ कोई मीडिया पर ,तो कोई संगीत पर, कोई अपने जीवन के अनुभव पर, कोई देश और समाज में होने वाली हलचलों पर आपको अपनी बात कहता दिखाई दे सकता है ! कभी कभी बहुत काम की चीज़ भी हाथ लग जाती है यूँ हीं "blogging walk "करते हुए ! मैं भी जिन blogs को बड़े चाव से पढ़ता हूँ अगर उनका नाम यहाँ लिखने लगूँ तो फ़हरिस्त बहुत लम्बी हो जाएगी, पर हाँ जिस ब्लॉग को अक्सर में पढ़ता हूँ वो है "इरफ़ान" जी का ब्लॉग "टूटी हुई बिखरी हुई "! सच कहूँ तो ब्लॉग जगत कभी कभी भूल भुलैयां जैसा मालूम होता है ,एक गली मैं दाखिल हुआ नहीं कि दूसरी गली आपको अपनी ओर खींच लेती है ! ब्लॉग जगत में कोई अपना "कबाड़खाना" खोले बैठा है ,तो किसी "मोहल्ले" में किसी बात पर बातचीत हो रही है! कोई "रेडियोवाणी "सुना रहा है, तो कोई अपना "रिजेक्टेड माल "यही बेच रहा है !
ये तो थी ब्लॉग जगत की कुछ बात ,लगे हाथ आपके साथ कुछ और भी बांटना चाहता हूँ ,पिछले दिनों एक फ़िल्म देखी "son of india",उस फ़िल्म का ये गाना मुझे न जाने क्यों ख़ास लगा ! इस फ़िल्म में इस बाल कलाकार ने बेहतरीन अभिनय कर दिल जीत लिया ! गीत के बोलों पर आपका ध्यान चाहता हूँ !

Sunday, August 9, 2009

सब गोल माल है

एक मिनट के लिए मान लीजिये कि आपसे कुछ महीनों के लिए आपका टेलिविज़न छीन लिया जाता है ,तब आपको कैसा महसूस होगा ?
क्या कहा?
ख़ाली ख़ाली सा लगेगा ! वक़्त काटे नहीं कटेगा !
और उन लोगों के लिए तो और भी परेशानी होगी जो अपना वक़्त अक्सर टेलीविजन के सामने ही गुज़ारते हैं ,भई फिर कहाँ "सच का सामना ", "बालिका वधू" और कहाँ आपका पसंदीदा कार्यक्रम देख पाएंगे आप?
एक वक़्त वो था जब टेलीविजन को बुद्धू बक्से कि संज्ञा दी जाती थी पर आज ये बुद्धू बक्सा कई बार ऐसे- ऐसे खेल भी दिखा जाता है कि इस "बुद्धू बक्से " को इस नाम से पुकारने पर हम ख़ुद "नासमझ "और "बुद्धू "लगने लगते हैं! आज के इस दौर में ये "बुद्धू बक्सा" हम सब पर राज कर रहा है, हमारे आस पास और पूरी दुनिया में होने वाले उलट फेर को चुटकियों में हमारी आँखों के सामने और हमसे रू -ब- रू करवा देता है ! ख़बर देने और ख़बर लेने का काम तो करता ही है पर कई बार अच्छे अच्छों की ख़बर भी ले लेता
है ! मज़े की बात तो ये है कि इसकी चपेट में कई मर्तबा ख़बर नवीस भी आ जाते हैं, और तब एक अलग ही दृश्य बनता है! कैसे?
ज़रा इस वीडियो को देखिये और ख़ुद ये फ़ैसला कीजिये की क्या ये "बुद्धू बक्सा " वाक़ई में बुद्धू कहलाने लायक़ है ?

Friday, July 17, 2009

आनंद मरा नहीं ,आनंद मरते नहीं


बात पिछले दिनों की है,बहुत दिनों से कोई फ़िल्म नहीं देखी थी! फिर अचानक ख़याल आया कि क्यों न एक बार फिर वो ही फ़िल्म देख ली जाए जो मेरी पसंदीदा फिल्मों में से एक रही हमेशा,वैसे भी आजकल कम ही फिल्में "देखने " लायक़ बनती है, असल तो "दिखाना" होता है!
खैर
जिस फ़िल्म का ज़िक्र करना था वो फ़िल्म थी सन् 1970 में आई ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म "आनंद "! आनंद किसी कल्पना की तरह है, हवा के झोंके की तरह ! कहानी दो दोस्तों की, उनके रिश्ते की,उनकी छोटी सी मुलाक़ात की !
"भास्कर बनर्जी और आनंद की ! इस फ़िल्म को देखने के बाद कहा जा सकता है कि फ़िल्म कई पहलु लिए हुए है ! एक दोस्त ( भास्कर बनर्जी , कैंसर एक्सपर्ट ) जो किसी भी क़ीमत पर अपने उस "आनंद " को बचाना चाहता है, जो वक्त के हर पल के साथ मौत के क़रीब जा रहा है.......! जो भास्कर को मौत के साथ ज़िन्दगी को जीने का हुनर सिखा जाता है! भास्कर जानता है कि वो आनंद को नहीं बचा पाएगा !
तभी
तो "भास्कर " ये कहने को मजबूर होता है कि "ज़िन्दगी को बचाने की क़सम निभाते निभाते अब क़दम- क़दम पर ऐसा महसूस होता है कि जैसे मौत को जिंदा रखने कि कोशिश कर रहा हूँ "!
"आनंद सहगल " एक ऐसा ख़ुशमिज़ाज शख्स जो खुशबू की तरह है, जहाँ जाता है अपने होने का ख़ास एहसास करा जाता है ! उसे "लिम्फोसर्कोमा ऑफ़ इंटस्टआइन है " यानी कैंसर ! आनंद के चरित्र से बिल्कुल अलग चरित्र है भास्कर का ,बिल्कुल रूखा,सख्त, जिसके मन् में जज़्बात तो है ,पर वो उन्हें ज़ाहिर नहीं करता ! आनंद को अपनी बीमारी का पूरा एहसास है "वो जानता है कि उसे क्या बीमारी है, उसके पास वक्त बहुत कम है , पर वो तो ज़िन्दगी के हर एक पल में छुपी खुशियाँ को जी लेना चाहता है ! तभी तो वो कहता है "ज़िन्दगी बड़ी होनी चाहिए लम्बी नहीं , मौत तो एक पल है ,मौत के डर से अगर ज़िंदा रहना छोड़ दिया ,तो मौत किसे कहते हैं "?
फ़िल्म "आनंद" ज़िन्दगी और मौत के फ़ल्सफ़े को बखूबी बता देती है ! हर पल को कैसे जिया जाए,इन छोटे छोटे पलों में, यही सब बताती है फ़िल्म "आनंद "!
इस फ़िल्म में भले ही कलाकारों के पात्र छोटे हों, पर सभी कहानी को सिर्फ़ आगे बढ़ाने में सहायक हैं !
यही ख़ास खूबी रही है ऋषिकेश मुख़र्जी की सभी फिल्मों की ,फिर चाहे फिल्म "आनंद" हो "मिली "या फिर फिल्म गोलमाल !
फिल्म आनंद के कई दृश्य ऐसे रहे जो आंखों में आँसू और दिल को छू जाते हैं !
फिल्म
के संवाद लिखे "गुलज़ार साहब" ने !ज़रा एक बानगी देखिये-
"हम सब तो रंग मंच की कटपुतलियाँ हैं, जिनकी डोर ऊपर वाले की उँगलियों में बंधी है ,कब कौन कैसे उठेगा ?ये कोई नहीं बता सकता है" !
और आख़िरकार वो लम्हा आ ही जाता है जिसके न आने की दुआ हर वो शख्स मांगता है ,जो आनंद को चाहता है, अपने आख़री लम्हों में आनंद कहता है कि "वो मरना नहीं चाहता ,क्योंकि उसका दोस्त भास्कर उसकी मौत को सह नहीं पाएगा" !
आनंद की मौत हो जाती है ......................
(आनंद मरा नहीं,आनंद मरते नहीं............... )
फिल्म का संगीत दिया सलिल चौधरी ने जो कहानी और कानों दोनों को भाता है,गीत गुलज़ार और योगेश के ! आइये सुनते हैं आनंद फिल्म का ये बेहतरीन गीत, जो ज़िन्दगी की हक़ीक़त को बयां करता है !
(फिल्म ज़रूर देखिएगा )
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